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Wednesday, February 1, 2017

जब मन्त्र जप करना हो

    हम अपने -अपने ईष्ट की पूजा तो अवश्य ही करते हैं। कभी ग्रह दोष मिटने के लिए पूजा-पाठ करते हैं तो कभी अपने ईष्ट के करीब रहने के लिए भी पूजन करते हैं। पूजन में मन्त्रों का बहुत महत्व है। मन्त्रों का उच्चारण और इनकी ध्वनि से वातावरण में सकारात्मकता उत्पन्न होती है। यही सकारत्मकता ही ग्रहों के दूषित प्रभाव का असर खत्म करती है और जीवन में नवसंचरण करती है।
           लेकिन हम में से सभी को तो मन्त्र उच्चारण नहीं आता है। ऐसे में तो पूजा का फल मिलने की बजाय कुफल ही मिलता है। एक कहानी कहीं पढ़ी थी, जिसमें एक व्यक्ति अपनी पत्नी की गम्भीर बीमारी की समस्या ले कर किसी बाबा जी के पास गया। बाबा जी ने एक श्लोक तो दिया साथ में एक सम्पुट भी दिया, जिसके अंत में " मम् भार्याम  रक्षितुमम् " था। वह व्यक्ति बेध्यानी में रक्षितुम की जगह भक्षितुम पढता गया और उसकी पत्नी नहीं बच सकी।
             कहानी सच्ची थी या नहीं, पता नहीं। लेकिन मंत्रो का गलत उच्चारण तो उल्टा असर तो देता ही है। आज कल टीवी पर विभिन्न ज्योतिषियों के कार्यक्रम आते हैं। जो  ज्ञानवर्धन तो करते ही हैं साथ में कुछ उपाय भी बताते हैं। जिनमें कभी -कभी मन्त्र जप भी होते हैं। उन मन्त्रों  ज्योतिषी कुछ बोलते हैं और टीवी स्क्रीन पर कई बार शब्दों का हेर -फेर होता है। जिनको ज्ञान है उनका तो ठीक है , लेकिन जिनको नहीं पता वे तो स्क्रीन पर लिखा ही मन्त्र उतार लेते हैं। फिर परिणाम सही कैसे होगा !
            इसलिए जब भी मन्त्र जप करना हो तो जानकार से पूछ कर और सही उच्चारण से करें।

ॐ शांति।

उपासना सियाग 

Friday, October 21, 2016

वृहस्पति से प्रभावित बच्चे

          वृहस्पति से प्रभावित बच्चे

वृहस्पति बुद्धि,ज्ञान, सम्मान, दया और न्याय का करक ग्रह है। वृहस्पति से प्रभावित बच्चे मेधावी और  न्याय प्रिय  होते हैं। अच्छा वृहस्पति ज्ञान के साथ -साथ मोटापा भी देता है। जो शरीर को थुल -थुला बना देता है। विशेषकर पेट और बाजू पर चर्बी की अधिकता रहेगी। ज्ञान की अधिकता से जिद्दी और अहंकारी बना देता है। अकेले रहने की प्रवृत्ति भी देता है।
        दूषित वृहस्पति बच्चे को पेट के रोग जैसे अपच, गैस आदि से ग्रसित करेगा। बच्चा चिड़चिड़ा भी रहेगा। वृहस्पति को संतुलित करने के लिए बच्चे को चपाती पर थोड़ी से हल्दी डाल कर खिलाना चाहिये। हींग का सेवन भी करवाना चाहिए।
           अगर मोटापा है और बच्चा अकेला रह कर खुश हो तो उसे पीले रंग से परहेज करवाना चाहिए।खेल, दौड़ -भाग वाले कार्यों में हिस्सा दिलवाना चाहिए। इससे बच्चे में सक्रियता आएगी और खुश रहेगा। बच्चे को बुजुर्गों के सानिध्य में भी छोड़ना चाहिए। बच्चे गाय की सेवा के लिए भी प्रेरित करें। पीली वस्तुओं का दान करवा दे। गुरुवार को केला खाने को न दें बल्कि गाय को खिलाये या मंदिर में दान दें। मुफ्त में किताबें न लें।
     विष्णु भगवान की आराधना और " ॐ नाराणय नमो नमः " मन्त्र का जप विशेष फलदायी रहेगा। ॐ शांति।

उपासना सियाग 

Tuesday, August 4, 2015

बच्चे और उनके स्वभाव को प्रभावित करते ग्रह

            बच्चे जैसे रंग बिरंगे फूल , सबका अलग रंग , खुशबू  और स्वभाव भी। कोई चंचल , कोई सीधा सा , कोई शांत तो कोई एक पल भी चैन से ना बैठने वाला होता है। यानि कि हर बच्चा अलग होता है। पार्क  ,स्कूल  या हम अगर हमारे आस पास देखें तो हर बच्चे में अलग -अलग विशेषता पाई जाती है।यह विशेषता ग्रह जनित ही होती है।
            एक स्कूल और एक ही कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे चाहे एक जैसी यूनिफार्म पहनते हों या एक जैसे विषय पढ़ रहे हों तो भी उनकी प्रकृति में फर्क होता है।फिर क्यों कोई बच्चा अलग-अलग विषय चुनता है , कोई खेल में अच्छा है तो कोई कला में तो कोई ऑल राउंडर है तो कोई भी विषय में अच्छा नहीं। यह भी ग्रहों का कमाल  होता है। यहाँ मैं सिर्फ एक ग्रह और स्वभाव ही बताऊँगी। वैसे ग्रहों की युति और स्थिति  से कुछ परिस्तिथियाँ भिन्न हो सकती है , फिर भी हर इंसान किसी एक ग्रह से अधिक प्रभावित तो होता ही है।
 सूर्य :--
      जिस बच्चे का सूर्य अच्छा होगा वह कक्षा में अग्रणी रहेगा। अपने शिक्षकों का चहेता बनेगा।खुद के सर्वश्रेष्ठ होने का गर्व भी करेगा। शरारत  कम करेगा लेकिन मन  ही मन उद्ग्विन रहेगा।
 कमज़ोर सूर्य वाला बच्चा सदैव चिंतित रहेगा । पढाई में अच्छा होने के बावजूद  परीक्षा या प्रतियोगिता के काफी समय पूर्व ही उसकी चिंता  में रहेगा बल्कि परीक्षा /प्रतियोगिता के दिन भी बहुत तनाव में रहेगा। पिता के ना रहने पर या पिता से सम्बन्ध अच्छे ना होने पर भी सूर्य कमज़ोर हो सकता है।
     अपने स्कूल बैग को समय से पहले ही तैयार रखेगा। उसे अपनी अलमारी /बैग में कोई अवांछित चीज़ सहन नहीं होगी।  गीत संगीत सुनने से दूर रहेगा और सुनेगा तो थोड़े धार्मिक संगीत।  नज़र का चश्मा भी जल्दी लग सकता है।
   अगर किसी बच्चे में ऐसा कोई लक्षण है तो उसे संतरी रंग के सरहाने के कवर और रुमाल दिए जाएँ। ताम्बे के गिलास में पानी पिलाया जाये। अगर दृष्टि दोष अधिक  हो तो वजन के बराबर गेहूं का दान किया जाये। बच्चे से गायत्री मंत्र का जाप करवाया जाये। अगर नहीं कर सकता तो सुबह जब स्कूल के लिए तैयार होते समय म्यूज़िक प्लेयर पर गायत्री मंत्र की सीडी चला दी जाये।

     चन्द्रमा :--चन्द्रमा से प्रभावित बच्चा बहुत प्यारा, आकर्षक, भावुक और अति कल्पनाशील होगा। बात -बात पर रूठना, रोना या किसी की भी बात को दिल से लगा कर ना भूलने वाला और बार-बार दोहराने वाला होगा। बहुत जल्द गला खराब होना,जुकाम -नज़ले की शिकायत  हो सकती है। चंचल होगा लेकिन शरारती नहीं होगा।
       चन्द्रमा के अच्छे होने या ना होने का सम्बन्ध हम उसके, उसकी माँ के साथ कैसा रिश्ता है, देख कर पहचान सकते हैं। अगर जन्म से माँ का साथ छूट जाये तो बच्चे का चन्द्रमा कमजोर हो जाता है। क्यूंकि माँ ही मन को समझ सकती है और चन्द्रमा मन को ही प्रभावित करता है। अगर माँ का साथ जन्म से ही छूट जाये तो बच्चा भावुक होगा।बड़े होने पर अवसाद ग्रस्त हो सकता है। शक/वहम् या फोबिया जैसी समस्याओं से ग्रसित हो सकता है।
       लेकिन अगर माँ का साथ है तो भी बच्चे में यह लक्षण  मिलते हैं तो माँ को बच्चे के साथ अधिक समय बिताना चाहिए।  भावुकता से परे  भी एक दुनिया है यह उसे दृढ़ता से समझाए। चांदी  के गिलास में पानी और दूध का सेवन करवाए। केवड़े का एसन्स की खुशबु सूंघने को दे और दिन में एक बार कुछ बूंदे पानी में डाल कर भी पिलाएं। सोमवार को मंदिर में एक मुट्ठी चावल और एक गिलास दूध का दान भी करें। शिव चालीसा / स्त्रोत का पाठ, सोमवार का व्रत और महामृत्युञ्जय का पाठ या श्रवण अनुकूल रहेंगे।
मंगल :-- मंगल से प्रभावित बच्चा मज़बूत कद काठी का, अपनी उम्र से बड़ा दिखेगा। कद भी सामान्य से लम्बा, ऊर्जा से भरपूर होगा। पढाई में, खेल में अच्छा होगा। ईमानदार, सत्यवादी होगा और हमेशा न्याय करेगा। पुलिस / सेना या उच्च प्रशासनिक सेवा में पद प्राप्त करता है।
      मंगल के दूषित हो जाने पर बच्चा बहन /भाइयों से दिखावे का प्यार रखेगा।  ज़िद्दी होगा। शरारती हो सकता है। शरारत भी कैसी ? तोड़/फोड़ वाली या मार /पीट की प्रवृत्ति वाली। सभी जगहों से हर दिन शिकायत मिलती है। बड़ा होने पर झूठ बोलने की प्रवृत्ति भी देखी गई है।  नशे और अपराध की तरफ झुकाव भी हो सकता है।
       अगर ऐसा है तो सबसे पहले बच्चे के ऊर्जा के स्तर को संतुलित करना चाहिए।अगर छोटा है और स्कूल नहीं जाता है तो उसे छोटी बॉल ला कर दीजिये और उसे दीवार पर मारने को कहें  या बॉल को फुटबॉल की तरह खेलने को कहें। लाल रंग से परहेज करें। स्कूल जाता है तो स्कूल में ही खेलों में भाग लेने में प्रेरित करें। ताम्बे के गिलास में पानी दें। ज़िद्द की तरफ अधिक ध्यान ना दे बल्कि जीवन में कुछ पाने के उद्देश्य को ज़िद में बदल दे। हनुमान जी के दर्शन करवाएं। हनुमान चालीसा सुन्दर कांड के पाठ का श्रवण कराएं।
        कमजोर मंगल से बच्चा दब्बू प्रवृत्ति का हो जाता है। दुबला/पतला, बुझा सा, ऊर्जा हीन दिखता है। यहाँ झूठ बोलने की प्रवृत्ति भी होगी। सच का सामना नहीं करेगा बल्कि पीठ पीछे वार की प्रवृत्ति रखेगा। मतलब कि दोहरे चेहरे वाला। ऐसे में बच्चे को सच बोलने के लिए प्रवृत्त करें। हाथ में लाल रंग का धागा या कलावा बाँध कर रखें। हनुमान जी की शरण में ले जाएँ। मसूर की दाल खिलाएं। ताम्बे के गिलास में पानी का सेवन भी करवाएं।


बुध :-- बुध ग्रह बुद्धि, वाणी, चर्म रोग का कारक होता है। बुध से प्रभावित बच्चे वाचाल होते हैं। अगर चंद्रमा का साथ मिल जाये तो अति कल्पनाशील भी हो जाते हैं।
        कमज़ोर बुध बच्चे की वाणी और लेखन को प्रभावित करेगा।बच्चा हकलाना,तुतलाना और प्रभावहीन वाणी , चर्म रोग , स्नायु रोग , कमजोर याददाश्त, दांतो के रोग और आलस्य आदि  से ग्रसित रहेगा। कटु भाषा का प्रयोग करेगा।
         कुंडली का अच्छा बुध बच्चे को बुद्धिमान, वाक्पटु , हाजिरजवाब और  हंसमुख बनाएगा।
       अगर बच्चा बुध के बुरे प्रभाव में हो तो हरी वस्तुओं का प्रयोग करें। भोजन में भी हरी-पत्ते वाली सब्जी का प्रयोग करें। हरी मूंग दाल का सेवन। हरी चारद बिछा कर सुलाएं। तांबे के गिलास में पानी का सेवन भी करवाएं। गणेश जी और दुर्गा माँ का पूजन-दर्शन करवाएं।
       कई बार बुध को केंद्र-अधिपत्य का दोष लग जाता है तो भी बच्चे की वाणी , त्वचा और बुद्धिमत्ता प्रभावित होती है। ऐसे में बच्चा बहुत अधिक वाचाल होकर कटुशब्दों का प्रयोग करेगा। याददाश्त भी प्रभावी होगी। ऐसी स्थिति में बच्चे के हाथों हरी वस्तुओं का दान करवाएं। तांबे के बर्तन में मूंगदाल का दान करवाएं। दुर्गा चालीसा  और  गणेश चालीसा का पाठ भी उचित रहेगा।
    ॐ शांति।

Friday, July 31, 2015

सावन में शिव पूजा से दूर होगा अवसाद



     ज्योतिष में मन का कारक ग्रह चन्द्रमा होता है और चन्द्रमा के स्वामी शिव जी है। कुंडली में जब चन्द्रमा दूषित होता है , पाप ग्रहों के साथ स्थित होता है या कमज़ोर जो जैसे अमावस्या का जन्म हो  और यदि बचपन में माँ का साथ छूट जाये तो भी चन्द्रमा कमजोर हो जाता है। क्यूंकि माँ ही हमारे मन की सुन सकती है। ऐसे में व्यक्ति हर बात मन पर रखता है। उसे लगता है की उसे कोई नहीं समझता। शक करने की आदत पड़ जाती है। अति सावधान हो जाता है। अँधेरे से भय आता है या हम कह सकते हैं कि उसे किसी भी बात का चीज़ का फोबिया /वहम रहने लग जाता है।
      शिव जी की पूजा से चन्द्रमा मज़बूत होगा। वैसे तो साल भर /सारी उम्र ही शिव जी की शरण चाहिए होती है और शिव जी जल्द ही प्रसन्न होने वाले देवता है। कहा जाता है कि सावन के महीने शिव जी धरती पर निवास करते हैं।
      कई बार लोग सवाल करते हैं कि शिव पर भांग , धतूरा चढ़ता है , श्मशान के निवासी है। भूत-गण उनके भक्त है , तो इसे हम यह भी सोच सकते हैं कि हमारा मन भी तो अवसादित हो कर भटक जाता है , बार -बार   श्मशान की तरफ जाता है। ऐसे में शिवजी श्मशान से  मन का सम्बल बन कर मन को मज़बूत करते है।
        मंदिरों में शिव लिंग पर चढ़ाया जानेवाला दूध जो कि थोड़ी ही देर में नाली में बहता नज़र आता है तो क्या यह सही है। ऐसे क्या शिव प्रसन्न होते हैं ? नहीं ! वह दूध पुजारी  को यूँ ही तो दिया जा सकता है। रोज़ एक मुट्ठी चावल और एक गिलास दूध देने की आदत डाल लेनी चाहिए , मन प्रसन्न रहने लग जायेगा।
         शिवजी को प्रसन्न करने के लिए सावन में इक्कीस लोटे गंगा जल से शिवजी का अभिषेक करना चाहिए। गंगा किनारे रहने वाले तो गंगा जल ले सकते हैं तो बाकी लोग अपने घर में पानी में गंगा जल डाल कर काम में ला सकते हैं। अक्सर यहाँ भी अज्ञानता वश कुछ गलती  हो जाती है और पूजा का पूर्ण फल नहीं मिल पाता।  गलती यह कि पानी भरने के बाद गंगाजल डाल दिया  जाता है ऐसा करना गंगाजल का अपमान करना होता है। जबकि पहले गंगाजल डालिये और बाद में   पानी। ओम नमः शिवाय मंत्र , महामृत्युंजय मन्त्र का जप विशेष फल दायी है।
  ओम शांति। 

Friday, June 12, 2015

पुरुषों के स्वभाव को प्रभावित करते नव ग्रह

     सौरमंडल के नौ ग्रह सारी  प्रकृति पर अलग -अलग तरह से प्रभाव डालती है। महिला ,पुरुष और बच्चे सभी की अलग -अलग प्रवृति होती है तो ग्रह भी अलग तरह से ही प्रभाव डालेंगे। यह लेख , पुरुषों पर ग्रहों के प्रभाव से उनके स्वभाव किस तरह का बन जाता है , पर दृष्टिकोण डालता है।

सूर्य :--  सूर्य पिता और आत्मा का कारक ग्रह है। जिन पुरुषों का सूर्य बलवान और उच्च अंशों का होता है राज योग करक होता है। अग्रणी ,न्याय प्रिय , समाज में अच्छा नाम और रौब होता है। सूर्य की  भांति ही तेज़ चेहरे पर होता है।
   जिनका सूर्य कमज़ोर होता है वे आत्मा पर बोझ सा लिए घूमते हैं। हर बात में संशय या अनिर्णय की  सी स्थिति रखते हैं। घटना के घटने से पूर्व ही चिंता ग्रस्त रहते हैं। ऐसे व्यक्ति का पिता से अच्छा तालमेल नहीं होता। जो असमय पिता को खो देते है उनका भी सूर्य कमजोर हो जाता है। आत्मा -हृदय पर बोझ रखते -रखते वे एक दिन हृदय रोगी बन जाते हैं। खराब सूर्य नेत्र रोग भी देता है।
   कुण्डली में अगर सूर्य अच्छा हो कर उग्र हो जाए तो व्यक्ति अहंकारी हो जाता है। बिन मांगे राय देने वाला या अपनी बात थोपने वाला बन जाता है। जब बात नहीं मानी  जाती तो धीरे -धीरे अवसाद में घिरने लग जाता है और हृदय रोग से ग्रसित हो जाता है। ऐसा इंसान ताम्बे में जल पिए। और सन्तरी रंग से परहेज़ करे बल्कि दान दे। गेहूं और गुड़ का दान भी लाभदायक रहेगा।
    इसके लिए सबसे अच्छा उपाय है कि पिता का सम्मान करे। नित्य सुबह उठते ही पिता के पैर छुए। पिता को कभी -कभी सफ़ेद वस्त्र भेंट दे। अगर पिता नहीं है तो पिता समान व्यक्तियों  का सम्मान करे।
   उगते हुए सूर्य के दर्शन , रविवार का व्रत , आदित्य -हृदय स्त्रोत का पाठ और सूर्य को जल अर्पण करें। गायत्री मन्त्र का जप भी लाभदायक रहेगा। उगते हुए सूर्य के रंग के रुमाल , सिरहाने के कवर , बेड -शीट , कमीज़ का रंग अधिक प्रयोग करें तो फायदेमंद रहेगा। ताम्बे के गिलास में पानी पीना भी लाभप्रद रहेगा।माणिक्य भी पहना जा सकता है लेकिन कुंडली का अच्छी तरह से विश्लेषण करवा कर ही।  सूर्य अगर अच्छा फल नहीं दे रहा हो तो या नेत्र रोग और हृदय रोग अधिक सता रहा हो तो जातक को जन्म-दिन या अमावस्या को अपने वजन के बराबर गेहूं और गुड़ गऊ -शाला में दान करे।

      चन्द्रमा :-- चंद्रमा मन और माता का करक है। जिन पुरुषों कि जन्म-कुंडली में चंद्रमा अच्छा फल देता है वे उच्च कल्पनाशील होते हैं। दृढ़ निश्चयी होते हैं। शुक्र और बुध के साथ चंद्रमा का मेल होता है वे अच्छे कलाकार , लेखक और फैशन जगत में प्रसिद्ध होते हैं।
      कमज़ोर चंद्रमा मन की स्थिति को डांवाडोल रखती है। शक करने की आदत , बिना कहे ही बात का अंदाज़ा लगा कर अपनी राय  प्रकट करना , मन के भाव या मन की बात ना कह पाना , बात करते हुए अगल-बगल झांकना और पैर हिलाना ये सब कमज़ोर चंद्रमा की  निशानी है।
 अच्छा चंद्रमा उग्र हो जाये तो व्यक्ति अति कल्पना शील हो जाता और मानसिक उन्माद से घिर जाता है। ऐसे में सफ़ेद वस्त्रों का दान और सोमवार को मंदिर में चावल और दूध का दान करे।
       इसके लिए सलेटी , काले और नीले रंगों का इस्तेमाल ना किया जाय तो बेहतर रहेगा। यहाँ यह सवाल उठाया जा सकता है कि पुरुषों के परिधान अधिकतर इन्ही रंगों के होते हैं तो ये रंग छोड़े कैसे जा सकते हैं। इसके लिए सफ़ेद अंतर्वस्त्र पहने जाएँ। सफ़ेद रुमाल और हलके रंग कि बेड -शीट का प्रयोग किया जा सकता है। पानी का दुरूपयोग न करें। चाँदी के गिलास  में पानी और दूध ,पानी में केवड़ा का एसेंस डाल  कर पीना भी लाभदायक रहेगा। पूर्णिमा के चाँद को निहारना भी कमज़ोर चन्द्र को मज़बूत करता है।
      चंद्रमा को मज़बूत और शांत करने के लिए शिव आराधना भी लाभकारी होती है।

   मंगल :-- मंगल रक्त और रक्त-संबधों ,भूमि और मकान का कारक है। यह शक्ति का परिचायक होता है। अच्छा मंगल व्यक्ति को सेनाध्यक्ष या समाज में अग्रणी बनाता है। यह जरूरी नहीं कि मज़बूत मंगल से प्रभावित व्यक्ति पुलिस या सेना में पद प्राप्त करता है। वह जो भी जिम्मेदारी उठता है उसे बखूबी निभाता  भी है। शानदार व्यक्तित्व , भाइयों से अच्छे सबंध अच्छे मंगल का परिचायक है। उत्तम भूमि और भवन का स्वामी होता है।
 कुंडली में उग्र मंगल व्यक्ति को अपराधी प्रवृत्ति का बनाता  है।
   कमज़ोर मंगल व्यक्ति को दब्बू और कायर बनाता है। चेहरा निस्तेज और कमज़ोर व्यक्तित्व , भाइयों से अनबन या उनसे दब कर रहना कमज़ोर मंगल का परिचायक है।

बुध :-- बुध ग्रह मौसी ,बुआ ,वाणी , बुद्धि और चर्म रोगों का कारक  है। जन्म कुंडली का बुध अगर दूषित ग्रहों के सम्पर्क में हो या कमज़ोर अवस्था में हो तो वह इंसान को कम बुद्धिमान या भाषा में कमजोर बना देता है। वह एक तरह से दब्बू बन के रह जाता है। कमजोर बुध को बलवान करने के लिए गणेश जी , सरस्वती माँ की आराधना करे। हरे रंग की  वस्तुओं का सेवन करे। हरे वस्त्रों का प्रयोग करें।
     लेकिन अगर यही बुध ग्रह कुंडली में बलवान हो जाता है तो  ऐसे बुध से प्रभावित इंसान बोलने में , लेखन कला में और वाकपटुता में माहिर होता है। हास्य -व्यंग्य में सबसे आगे और बात में से बात निकलने वाला होता है। किसी इंसान का अच्छा बुध हो तो वह बात इस तरह से कह जाता है कि सामने वाले को मालूम भी हो जाये और किसी को पता भी नहीं चले।
      लेकिन जब भी बुध  केंद्र का स्वामी हो कर केन्द्राधिपत्य दोष से ग्रसित हो जाता है। तब यह अपने विपरीत परिणाम देने लग जाता है। ऐसा बुध इंसान की  बुद्धि पर हावी होकर बुद्धि पर नियंत्रण कर लेता है। उसे नहीं मालूम चलता कि वह क्या बोल रहा है। सामने वाले के मन को  कितनी चोट पहुंचेगी। वह इंसान बुध के वशीभूत हो कर स्वयं ही निर्णायक बन जाता है कि क्या सही है और क्या गलत। वह सिर्फ अपने विचार ही दूसरे पर थोपता है। ऐसा बुध इंसान को अलग थलग कर देता है और वह एक दिन अवसाद में घिर जाता है।
    ऐसे में उसे हरे रंग से परहेज़ करना चाहिए। हरा वस्त्र , हरा चारा और मूँग की दाल का दान करे। फिटकरी से दांत साफ करे।

वृहस्पति :-- वृहस्पति बुद्धि ,ज्ञान , सम्मान , दया और न्याय का करक ग्रह है। जिस व्यक्ति का जन्म कुंडली में वृहस्पति ग्रह उत्तम स्थिति में होता है वह व्यक्ति विद्वान और धर्माधिकारी होता है। वह किसी के प्रति अन्याय नहीं करता और ना ही होने देता है। पूजा -पाठ मे अधिक ध्यान देता है।
   लेकिन ज्ञान की अधिकता होने से कभी -कभी व्यक्ति में अहंकार भी आने लगता है। बिन मांगे राय या कहिये कि अपनी  बात ही सर्वोपरि रख कर थोप देना भी स्वभाव बना लेता है।  और यह अहंकार व्यक्ति में अकेलापन और  शरीर में मेद की अधिकता करता है। जिस कारण मोटापे में वृद्धि होकर शरीर थुलथुला हो जाता है।
  वृहस्पति को सुधारने के लिये व्यक्ति को पूजा -पाठ की  अधिकता से बचना चाहिए। सुबह या शाम को मंदिर जाना चाहिए। लेकिन आरती के समय नहीं बल्कि पहले या बाद में। ऐसा करने से अपने ईष्ट से अधिक नज़दीकी महसूस कर सकता है और मन शांत रहेगा।
   लोगों से मेल -जोल अधिक बढ़ाये और उनका दुःख -दर्द सुने , समस्याओं का समाधान करें। अगर किसी वृद्धाश्रम मे जा कर उनका दर्द बाँट सके तो वृहस्पति अच्छे फ़ल देने लगता है। यहाँ पर मेरे कहने का अभिप्राय यह नही है कि वृद्धाश्रम मे जाकर फल -मिठाइयां बाँट कर आये। वह जाकर उनके चेहरे पर मुस्कान और दिल मे ख़ुशी बाँट कर आयें तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
   पीले रंग से परहेज़ करें। वीरवार को पीली  भोज्य वस्तु या वस्त्र दान दी जा सकती है। वीरवार का व्रत भी लाभक़ारी रहेगा। विष्णु भगवान की पूजा और मन्त्र भी लाभकारी हैं।
 कमज़ोर वृहस्पति व्यक्ति को निस्तेज , नास्तिक ,निराशावादी , पेट संबन्धित बीमारी और विवाह और संतान मे विलम्ब देता है। अगर ऐसा है तो वृहस्पति को मज़बूत करने के उपाय करने चाहिए। पीला भोजन ,वस्त्र का प्रयोग अधिक किया जाना चाहिए। व्रत करना भी लाभकारी रहेगा। वृद्ध ब्राह्मण की सेवा , मज़बूरों की  शिक्षा में सहयोग भी वृहस्पति को मज़बूत बनाता है।

शुक्र :-- शुक्र ग्रह पुरुषों में विवाह , संतान , मनोरंजन , शयनसुख और ऐश्वर्य  का कारक  है। शुक्र से प्रभावित व्यक्ति ( अगर लग्न में शुक्र हो ) सांवले रंग का होता है। शुक्र गोरे रंग का नहीं बल्कि सौंदर्य का प्रतीक होता है। चेहरे से ही झलकता है अच्छा शुक्र। अच्छा शुक्र व्यक्ति को आकर्षक व्यक्तित्व के साथ -साथ उत्तम भवन ,वाहन , वस्त्राभूषण और सुखसुविधा प्रदान करता है। संगीत , कला और काव्य में पारंगत होता है। जन्म कुंडली का अच्छा शुक्र व्यक्ति को उत्तम चिकित्स्क और ज्योतिषी भी बना सकता है।
      कमज़ोर शुक्र  सौंदर्य में कमी सुख सुविधा में कमी , जीवन साथी से दूरी , नेत्र रोग,  गुप्तेन्द्रीय रोग,वीर्य दोष से होने वाले रोग , प्रोस्ट्रेट ग्लैंड्स, प्रमेह,मूत्र विकार ,सुजाक , कामान्धता,श्वेत या रक्त प्रदर ,पांडु इत्यादि रोग  उत्पन्न करता है।  
     कमज़ोर शुक्र को बलवान करने के लिए क्रीम रंग के कपड़ों का प्रयोग करना चाहिए। शुक्रवार का व्रत , देवी उपासना ( लक्ष्मी और दुर्गा ) करनी चाहिए। शुक्रवार को कन्याओं को खीर खिलाना , गाय को चारा डालना भी उचित रहेगा।  आलू का दान भी शुक्र मज़बूत करता है। 
   दूषित शुक्र से प्रभावित व्यक्ति समाज विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहता है। मित्रों से नहीं बनती ,स्त्रियों में अधिक रूचि लेता है। सिनेमा , अश्लील-साहित्य और काम-वासना की ओर अधिक ध्यान रहता है। ऐसे में व्यक्ति को दुर्गा माँ की आराधना , नारी जाति  के प्रति सम्मान की भावना और सफ़ेद दूधिया रंग के वस्त्रों का दान करना चाहिए। खुशबुओं का प्रयोग अधिक मात्रा में ना करे। 

शनि :--  शनिग्रह के कुंडली में ग्रहों के साथ और किस भाव में स्थित है यह महत्वपूर्ण होता है क्यूंकि शनि जिस किसी भी भाव में स्थित होता है उस भाव की वृद्धि करता है लेकिन जिस भाव पर दृष्टि पड़ती है उस भाव के सुखों में कमी लाता है।
  अच्छा शनि व्यक्ति को न्याय प्रिय , विदेशी भाषा में पारंगत , उच्चाधिकारी , लोहे सम्बन्धी व्यापार का कारक बनता है। शनि ग्रह से प्रभावित व्यक्ति अपनी अलग विचारधारा बना कर रखता है। समाज से हट कर सोच रखता है। 
     कमज़ोर शनि से व्यक्ति आलसी , कामचोर और निर्धन बनता है। झगड़ालू भी बनाता है शनि । 
   शनि अँधेरे का कारक है जिस कारण से व्यक्ति निशाचर बना रहता है मतलब यह है कि अपराधी प्रवृत्ति अपना लेता है। वात रोग , अस्थि रोग , मनोन्माद भी यही देता है। पेट के रोग,जंघाओं के रोग,टीबी,कैंसर आदि रोग भी शनि की देन है। 
      शनि  को मज़बूत के लिए व्यक्ति को आचरण में सुधार लाना होगा। देश के प्रति प्रेम ,सेवा और सद्भावना रखनी होगी। हर कोई तो सीमा पर जा कर प्रहरी नहीं बन सकता तो देश सेवा के और भी मायने है जैसे राष्ट्रिय संपत्ति की सुरक्षा , पानी -बिजली की फिजूल खर्ची ना करना और अपने देश के प्रति कर्तव्यों का भली  भांति पालन करना भी शनि ग्रह अच्छा फल देने लग जाता है। 
    अपने नौकरों  दया भाव रखना भी शनि को अनुकूल बनाता है। 
काली माता , हनुमान जी और शिव जी की आराधना , शनि स्त्रोत ,हनुमान चालीसा , सुन्दरकाण्ड का पाठ तथा दुर्गा शप्तशती का पाठ शनि को शांत करने में सहायक है। काले , गहरे नीले रंगों का इस्तेमाल ना करें बल्कि शनिवार को दान दें। शनिवार को राज़मा , काले उड़द और तेल का दान भी उपयुक्त रहेगा। शनिवार को चमेली के तेल का दीपक हनुमान जी के आगे करना शनि को शांत करेगा। 

राहु :--   राहु एक तमोगुणी मलेच्छ और छाया  ग्रह माना गया है। इसका प्रभाव शनि की भांति  ही होता है।
यह तीक्ष्ण  बुद्धि , वाक्पटुता , आत्मकेंद्रिता ,स्वार्थ , विघटन और अलगाव , रहस्य  मति भ्रम , आलस्य  छल - कपट ( राजनीति ) , तस्करी ( चोरी ), अचानक घटित होने वाली घटनाओं , जुआ  और  झूठ का कारक  है।
  राहू से प्रभावित पुरुष  एक अच्छा  जासूस या वकील , अच्छा राजनीतीज्ञ  हो सकता  है। वह आने वाली बात को पहले ही भांप लेता है। विदेश यात्राएं भी बहुत करवाता है राहु।
  कुंडली में राहू जिस राशि में स्थित होता है वैसे ही परिणाम देने लगता है। अगर वृहस्पति के साथ या उसकी राशि में हो तो ज्योतिष की तरफ रुझान देगा । शनि के प्रभाव में तो तांत्रिक - विद्या में निपुण होगा।
    राहु से प्रभावित पुरुष भ्रम में रहता है और कई बार गलत फैसले ले लेता है या अनैतिक कार्यों में फंसा देता है। यहाँ पर अगर राहु अच्छा हुआ तो बहुत रूपये , ऊँचा पद आदि दिलवाता है। लेकिन यही राहु व्यक्ति को रूपये और पद का अभिमान भी देता है। इसलिए व्यक्ति घमंडी ,पाखंडी और क्रूर हो जाता है।
        राहु की महादशा 18 वर्ष के लिए होती है। महादशा के शुरूआत में राहु व्यक्ति को भ्रम जाल में फंसाकर बहुत धन दिलवाता है लेकिन यही राहु महादशा के अंत में सब कुछ समेट कर ले भी जाता है। अगर इस दौरान व्यक्ति स्व विवेक से काम ले और सही मार्ग पर चले तो राहु के दुष्प्रभाव नहीं होंगे।
          दूषित राहु की स्थिति में व्यक्ति मलिन और फटे वस्त्र ( अंतर्वस्त्र भी ) पहनता है , चर्म  -रोग ,मति -भ्रम , अवसाद रोग से ग्रस्त हो सकता है।
          राहु को शांत करने के लिए दुर्गा माँ की आराधना करनी चाहिए। खुल कर हँसना चाहिए। मलिन और फटे वस्त्र नहीं पहनना चाहिए। गहरे नीले रंग से परहेज़ करना चाहिए। काले रंग की गाय की सेवा करनी चाहिए।मधुर संगीत सुनना चाहिए। रामरक्षा स्त्रोत का पाठ भी लाभ दायक रहेगा।
     इसकी शांति के लिए गोमेद रत्न धारण किया जा सकता है लेकिन किसी अच्छे ज्योतिषी की राय ले कर ही।

केतु :-- केतु ग्रह उष्ण ,तमोगुणी पाप ग्रह है।केतु का अर्थ ध्वजा भी होता है किसी स्वग्रही ग्रह के साथ यह हो तो उस ग्रह का फल चौगुना कर देता है।यह नाना , ज्वर , घाव , दर्द , भूत -प्रेत , आंतो के रोग , बहरापन और हकलाने का कारक है। यह मोक्ष का कारक भी माना  जाता है।
   केतु मंगल की भांति कार्य करता है। यदि दोनों की युति हो तो मंगल का प्रभाव दुगुना हो जाता है।यदि केतु शनि के साथ हो तो यहाँ शनि-मंगल की युति के सामान ही मानी जाती है।
      राहू की भांति केतु भी छाया ग्रह है इसलिए इसका अपना कोई फल नहीं होता है।जिस राशि में या जिस ग्रह के साथ युति करता है वैसा ही फल देता है।
   केतु से प्रभावित पुरुष कुछ भ्रमित  सा रहता है  है। शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती क्यूँ कि यह ग्रह मात्र धड़ का ही प्रतीक होता है और राहू इस देह का कटा सर होता है।   अच्छा केतुपुरुष  को उच्च पद , समाज में सम्मानित , तंत्र-मन्त्र और ज्योतिष का ज्ञाता बनाता है।
                      बुरा केतु व्यक्ति  की बुद्धि भ्रमित कर के उसे  सही समय  निर्णय लेने में बाधित करता है। बार -बार कार्य-नौकरी बदलने की सोचता है।
          चर्म रोग से ग्रसित कर देता है। काम-वासना की अधिकता भी कर देता है जिसके फलस्वरूप कई बार दाम्पत्य -जीवन कष्टमय हो जाता है। वाणी भी कटु कर देता है।
       केतु का प्रभाव अलग - अलग ग्रहों के साथ युति और अलग-अलग भावों में स्थिति होने के कारण इसका प्रभाव ज्यादा या कम हो सकता है। इसके लिए किसी अच्छे ज्योतिषी से कुंडली का विश्लेषण करवाकर ही उपाय करवाना चाहिए।
     केतु के लिए लहसुनिया नग उपयुक्त माना  गया है।मंगल वार का व्रत और हनुमान जी की आराधना विशेष फलदायी होती है।चिड़ियों को बाजरी के दाने खिलाना और भूरे-चितकबरे वस्त्र का दान तथा इन्हीं रंगों के पशुओं की सेवा करना उचित रहेगा।



ॐ शांति ...

 

Tuesday, April 7, 2015

कुछ आसान और जरुरी बातें...


      कुछ  बातें हम लोग देख सुन कर अनजान हैं। उसमे एक है चरण स्पर्श करना। पैरों में विष्णु  निवास माना जाता है। चरण स्पर्श करने वाले को ना केवल जिसके सामने झुका गया है बल्कि विष्णु भगवान का आशीर्वाद भी स्वतः मिल जाता है। लेकिन इसका भी  तरीका - नियम होता है
  १) भोजन करते हुए स्त्री /पुरुष के चरण स्पर्श  करना चाहिए। जैसे हम किसी के घर जाते हैं और सामने वाला भोजन कर रहा हो। सभ्यता तो यही है कि  अगर सामने वाला उम्र में  बड़ा  है , आशीर्वाद  के लिए झुका जाये। यहाँ पर हम सिर्फ प्रणाम कर के बैठ जाएँ और सामने वाले के भोजन खत्म करके हाथ धोने का इंतज़ार करें तो बेहतर है। क्यूंकि जूठे हाथों से आशीर्वाद देना उचित  नहीं है।
२) जब हम मंदिर में जाएँ और कोई उम्र से बड़ा मिल जाये , या कोई जागरण - सत्संग हो वहां भी चरण स्पर्श उचित नहीं है। क्यूंकि वहां ईश्वर ही सबसे बड़ा है इंसान के आगे झुकना उचित नहीं। अभिवादन जरूर किया जा सकता है। 

Tuesday, February 4, 2014

लग्न कुंडली से जानिए अपने ईष्ट देव

 हम सब प्रतिदिन विभिन्न देवी -देवताओं का पूजन करते हैं। लगभग सभी सकाम पूजा ही करते हैं। कहने का मतलब यह है कि हम हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए ही ईश्वर को मानते है। बहुत कम लोग होते हैं  निष्काम पूजा करते हैं। बहुत सारे लोगों कि यह शिकायत होती है कि वो पूजा -व्रत आदि बहुत करते हैं फिर भी फल नहीं मिलता।
      मैं यहाँ कहना चाहूंगी कि हमें काम तो बिजली विभाग में होता है और चले जाते हैं जल-विभाग में ! जब हम गलत कार्यालय में जायेंगे तो काम कैसे होगा। इसी प्रकार हर कुंडली के अनुसार उसके अपने अनुकूल देवता होते हैं।
     किसी भी कुंडली के लग्न /प्रथम भाव , पंचम भाव  और  नवम भाव  में स्थित राशि के अनुसार इष्ट देव निर्धारित होते है और इनके अनुसार ही रत्न धारण किये जा सकते हैं।
      मेष लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर प्रथम राशि मेष होती है तो वह मेष लग्न की  कुंडली कही जायेगी। मेष लग्न में पांचवे भाव में सिंह राशि और नवम भाव में धनु राशि होती है।
       मेष राशि का स्वामी मंगल , सिंह राशि का स्वामी है सूर्य और धनु राशि का स्वामी वृहस्पति है। इस कुंडली के लिए अनुकूल देव हनुमान जी , सूर्य देव और विष्णु भगवान है ।
       मेष लग्न के लिए हनुमान जी की आराधना , मंगल के व्रत , सूर्य चालीसा , आदित्य - हृदय स्त्रोत , राम रक्षा स्त्रोत , रविवार का व्रत , वृहस्पति वार का व्रत , विष्णु पूजन करना चाहिए। मूंगा , माणिक्य और पुखराज रत्न अनुकूल रहेंगे।
   
      वृषभ लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव  में अगर द्वितीय  राशि वृषभ  होती है तो वह वृषभ लग्न की  कुंडली कही जायेगी। वृषभ लग्न में पांचवे भाव में कन्या राशि और नवम भाव में मकर  राशि होती है।
       वृषभ राशि का स्वामी शुक्र , कन्या राशि का बुध और मकर राशि के स्वामी शनि देव है।
वृषभ लग्न वालों के लिए लक्ष्मी देवी , गणेश जी और दुर्गा देवी की  आराधना उचित रहेगी। लक्ष्मी चालीसा , दुर्गा चालीसा और गणेश चालीसा का  पाठ करना चाहिए।
      इस लग्न के लिए हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है ।

मिथुन लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर तृतीय   राशि मिथुन   होती है तो वह मिथुन  लग्न की  कुंडली कही जायेगी। मिथुन  लग्न में पांचवे भाव में तुला  राशि और नवम भाव में कुम्भ राशि होती है।
    मिथुन राशि का स्वामी बुध , तुला राशि का शुक्र और कुंभ राशि का स्वामी शनि देव हैं।
इस लग्न के लिए गणेश जी , लक्ष्मी देवी और काली माता अराध्य होगी।  कुम्भ राशि के स्वामी शनि होने के कारण शनि देव को प्रसन्न और शांत रखने के उपाय किये जा सकते हैं।
इस लग्न के लिए पन्ना , हीरा और नीलम अनुकूल रत्न  हैं।

कर्क लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर चतुर्थ   राशि कर्क   होती है तो वह कर्क   लग्न की  कुंडली कही जायेगी। कर्क  लग्न के  पांचवे भाव में वृश्चिक  राशि और नवम भाव में मीन  राशि होती है।
कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा,वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल और मीन राशि के स्वामी वृहस्पति होते है। इस लग्न के लिए शिव जी , हनुमान जी और विष्णु जी अराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए मोती , मूंगा और पुखराज अनुकूल रत्न हैं।

     सिंह लग्न :--  जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर पंचम राशि सिंह  होती है तो वह सिंह  लग्न की  कुंडली कही जायेगी।  सिंह  लग्न के  पांचवे भाव में धनु  राशि और नवम भाव में मेष   राशि होती है।
  सिंह राशि का स्वामी सूर्य देव , धनु राशि के स्वामी वृहस्पति और मेष राशि के स्वामी मंगल होता है।
इस लग्न  के लिए सूर्य देव , विष्णु जी और हनुमान जी आराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए माणिक्य , मूंगा और पुखराज रत्न अनुकूल होते हैं।

       कन्या लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर षष्ठ राशि कन्या  होती है तो वह कन्या लग्न  की  कुंडली कही जायेगी। इस लग्न के पांचवे भाव में मकर राशि और नवम भान में वृषभ राशि होती है।
कन्या राशि का स्वामी बुध , मकर राशि का स्वामी शनि और वृषभ राशि का स्वामी शुक्र होता है।
इस लग्न के लिए गणेश जी , दुर्गा देवी ,लक्ष्मी देवी आराध्य देव होते हैं और पन्ना, नीलम और हीरा अनुकूल रत्न होते हैं।

       तुला लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर सप्तम राशि तुला हो तो वह तुला लग्न की  कुंडली कही जायेगी। तुला लग्न में पांचवे भाव में कुम्भ राशि और नवम भाव में मिथुन राशि होती है। तुला राशि का स्वामी शुक्र , कुम्भ राशि का स्वामी शनि और मिथुन राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए लक्ष्मी देवी , काली देवी , दुर्गा देवी और गणेश जी आराध्य  देव हैं और हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है।

     वृश्चिक लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर अष्ठम  राशि वृश्चिक हो तो वह वृश्चिक लग्न की  कुंडली कही जायेगी। वृश्चिक लग्न में पांचवे भाव में मीन राशि और नवम भाव में कर्क  राशि होती है। वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल , मीन राशि का स्वामी वृहस्पति और कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा होता है। इस लग्न के लिए हनुमान जी , विष्णु जी और शिव जी अराध्य देव होते है और मूंगा , पुखराज और मोती अनुकूल रत्न है।

     धनु लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर नवम राशि धनु  हो तो वह धनुलग्न की  कुंडली कही जायेगी। धनु लग्न में पांचवे भाव में मेष  राशि और नवम भाव में सिंह राशि होती है। धनु राशि का स्वामी वृहस्पति , मेष राशि का स्वामी मंगल और सिंह राशि का स्वामी सूर्य होता है।  इस लग्न के लिए विष्णु जी ,हनुमान जी और सूर्य देव आराध्य देव हैं और पुखराज , मूंगा और माणिक्य अनुकूल रत्न है।

    मकर लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर दशम  राशि मकर  हो तो वह मकर लग्न की  कुंडली कही जायेगी। मकर लग्न में पांचवे भाव में वृषभ राशि और नवम भाव में कन्या राशि होती है। मकर राशि का स्वामी शनि , वृषभ राशि का स्वामी शुक्र और कन्या राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए शनि देव , हनुमान जी , दुर्गा देवी , लक्ष्मी देवी और गणेश जी आराध्य देव है और नीलम , हीरा और पन्ना अनुकूल रत्न है।

   कुम्भ लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर एकादश  राशि कुम्भ हो तो वह कुम्भ लग्न की  कुंडली कही जायेगी। कुम्भ लग्न में पांचवे भाव में मिथुन राशि और नवम भाव में तुला  राशि होती है।कुम्भ राशि का स्वामी शनि , मिथुन राशि का स्वामी बुध और तुला राशि का स्वामी शुक्र होता है। इस लगन के लिए शनि देव , काली देवी , गणेश जी , दुर्गा देवी और लक्ष्मी देवी आराध्य देव है और नीलम , पन्ना और हीरा अनुकूल रत्न है।

   मीन लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वादश  राशि मीन  हो तो वह मीन लग्न की  कुंडली कही जायेगी। मीन लग्न में पांचवे भाव में कर्क  राशि और नवम भाव में वृश्चिक  राशि होती है। मीन राशि का स्वामी वृहस्पति , कर्क राशि का स्वामी चन्द्र और वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल होता है।  इस लग्न के लिए  विष्णु जी , शिव जी और हनुमान जी आराध्य देव है और पुखराज , मोती और मूंगा अनुकूल रत्न है।

     लेकिन यहाँ यह भी देखा जायेगा कि उपरोक्त राशि स्वामी किस भाव में और कितने अंशो पर स्थित है। क्या वो उच्च या नीच के तो नहीं है। अक्सर विद्वान् जन ग्रह के उच्च या नीच के होने पर रत्न पहना देते हैं जो कि उचित नहीं है। उच्च का ग्रह तो स्वतः ही अच्छा फल देता है।  नीच ग्रह का रत्न पहनने से उस ग्रह के नीचत्व में ही वृद्धि होती है। ऐसे में उस ग्रह को शांत करने के लिए पूजा और व्रत आदि उचित रहेगी। खराब ग्रह को अनुकूल बनाने के लिए उस देव का चालीसा का पाठ करना चाहिए।
   
       यहाँ पर यह ध्यान रखने वाली बात है कि जो ग्रह अधिक कमजोर हो उसे बलवान करने के लिए पूजा - व्रत आदि करें। रत्न भी धारण किया जा सकता है लेकिन कुंडली को अच्छी तरह विश्लेषण करवा कर ही। क्यूंकि कई बार उपरोक्त तीनों भावों के स्वामी तीसरे , छठे , आठवें और बाहरवें भाव में स्थित होते हैं। इन भावों में स्थित ग्रहों के रत्न भी धारण नहीं किये जा सकते। इस स्थिति  में व्रत-पूजन और दान ही उचित रहेगा।
 
     जिनके पास कुंडली हैं वे तो यह जान सकते हैं कि उनके ईष्ट देव कौन है। लेकिन जिनके पास कुंडली नहीं है और ना ही कोई विवरण है तो वे क्या करे या कैसे जाने  कि उनका ईष्ट कौन है !
    हर इंसान की प्रकृति और व्यवहार ग्रहों से ही तय होती है। किसी भी इंसान को उसके ईष्ट उसके अंतर्मन को आकर्षित करते हैं। अपनी पसंद के रंगो के अनुसार भी तय कर सकते हैं कि उनका ईष्ट देव कौन हो सकता है।

उपासना सियाग ( अबोहर , पंजाब )
ॐ शांति।।