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Tuesday, April 7, 2015

कुछ आसान और जरुरी बातें...


      कुछ  बातें हम लोग देख सुन कर अनजान हैं। उसमे एक है चरण स्पर्श करना। पैरों में विष्णु  निवास माना जाता है। चरण स्पर्श करने वाले को ना केवल जिसके सामने झुका गया है बल्कि विष्णु भगवान का आशीर्वाद भी स्वतः मिल जाता है। लेकिन इसका भी  तरीका - नियम होता है
  १) भोजन करते हुए स्त्री /पुरुष के चरण स्पर्श  करना चाहिए। जैसे हम किसी के घर जाते हैं और सामने वाला भोजन कर रहा हो। सभ्यता तो यही है कि  अगर सामने वाला उम्र में  बड़ा  है , आशीर्वाद  के लिए झुका जाये। यहाँ पर हम सिर्फ प्रणाम कर के बैठ जाएँ और सामने वाले के भोजन खत्म करके हाथ धोने का इंतज़ार करें तो बेहतर है। क्यूंकि जूठे हाथों से आशीर्वाद देना उचित  नहीं है।
२) जब हम मंदिर में जाएँ और कोई उम्र से बड़ा मिल जाये , या कोई जागरण - सत्संग हो वहां भी चरण स्पर्श उचित नहीं है। क्यूंकि वहां ईश्वर ही सबसे बड़ा है इंसान के आगे झुकना उचित नहीं। अभिवादन जरूर किया जा सकता है। 

Tuesday, February 4, 2014

लग्न कुंडली से जानिए अपने ईष्ट देव

 हम सब प्रतिदिन विभिन्न देवी -देवताओं का पूजन करते हैं। लगभग सभी सकाम पूजा ही करते हैं। कहने का मतलब यह है कि हम हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए ही ईश्वर को मानते है। बहुत कम लोग होते हैं  निष्काम पूजा करते हैं। बहुत सारे लोगों कि यह शिकायत होती है कि वो पूजा -व्रत आदि बहुत करते हैं फिर भी फल नहीं मिलता।
      मैं यहाँ कहना चाहूंगी कि हमें काम तो बिजली विभाग में होता है और चले जाते हैं जल-विभाग में ! जब हम गलत कार्यालय में जायेंगे तो काम कैसे होगा। इसी प्रकार हर कुंडली के अनुसार उसके अपने अनुकूल देवता होते हैं।
     किसी भी कुंडली के लग्न /प्रथम भाव , पंचम भाव  और  नवम भाव  में स्थित राशि के अनुसार इष्ट देव निर्धारित होते है और इनके अनुसार ही रत्न धारण किये जा सकते हैं।
      मेष लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर प्रथम राशि मेष होती है तो वह मेष लग्न की  कुंडली कही जायेगी। मेष लग्न में पांचवे भाव में सिंह राशि और नवम भाव में धनु राशि होती है।
       मेष राशि का स्वामी मंगल , सिंह राशि का स्वामी है सूर्य और धनु राशि का स्वामी वृहस्पति है। इस कुंडली के लिए अनुकूल देव हनुमान जी , सूर्य देव और विष्णु भगवान है ।
       मेष लग्न के लिए हनुमान जी की आराधना , मंगल के व्रत , सूर्य चालीसा , आदित्य - हृदय स्त्रोत , राम रक्षा स्त्रोत , रविवार का व्रत , वृहस्पति वार का व्रत , विष्णु पूजन करना चाहिए। मूंगा , माणिक्य और पुखराज रत्न अनुकूल रहेंगे।
   
      वृषभ लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव  में अगर द्वितीय  राशि वृषभ  होती है तो वह वृषभ लग्न की  कुंडली कही जायेगी। वृषभ लग्न में पांचवे भाव में कन्या राशि और नवम भाव में मकर  राशि होती है।
       वृषभ राशि का स्वामी शुक्र , कन्या राशि का बुध और मकर राशि के स्वामी शनि देव है।
वृषभ लग्न वालों के लिए लक्ष्मी देवी , गणेश जी और दुर्गा देवी की  आराधना उचित रहेगी। लक्ष्मी चालीसा , दुर्गा चालीसा और गणेश चालीसा का  पाठ करना चाहिए।
      इस लग्न के लिए हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है ।

मिथुन लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर तृतीय   राशि मिथुन   होती है तो वह मिथुन  लग्न की  कुंडली कही जायेगी। मिथुन  लग्न में पांचवे भाव में तुला  राशि और नवम भाव में कुम्भ राशि होती है।
    मिथुन राशि का स्वामी बुध , तुला राशि का शुक्र और कुंभ राशि का स्वामी शनि देव हैं।
इस लग्न के लिए गणेश जी , लक्ष्मी देवी और काली माता अराध्य होगी।  कुम्भ राशि के स्वामी शनि होने के कारण शनि देव को प्रसन्न और शांत रखने के उपाय किये जा सकते हैं।
इस लग्न के लिए पन्ना , हीरा और नीलम अनुकूल रत्न  हैं।

कर्क लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर चतुर्थ   राशि कर्क   होती है तो वह कर्क   लग्न की  कुंडली कही जायेगी। कर्क  लग्न के  पांचवे भाव में वृश्चिक  राशि और नवम भाव में मीन  राशि होती है।
कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा,वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल और मीन राशि के स्वामी वृहस्पति होते है। इस लग्न के लिए शिव जी , हनुमान जी और विष्णु जी अराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए मोती , मूंगा और पुखराज अनुकूल रत्न हैं।

     सिंह लग्न :--  जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर पंचम राशि सिंह  होती है तो वह सिंह  लग्न की  कुंडली कही जायेगी।  सिंह  लग्न के  पांचवे भाव में धनु  राशि और नवम भाव में मेष   राशि होती है।
  सिंह राशि का स्वामी सूर्य देव , धनु राशि के स्वामी वृहस्पति और मेष राशि के स्वामी मंगल होता है।
इस लग्न  के लिए सूर्य देव , विष्णु जी और हनुमान जी आराध्य देव होंगे।
इस लग्न के लिए माणिक्य , मूंगा और पुखराज रत्न अनुकूल होते हैं।

       कन्या लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम  भाव में अगर षष्ठ राशि कन्या  होती है तो वह कन्या लग्न  की  कुंडली कही जायेगी। इस लग्न के पांचवे भाव में मकर राशि और नवम भान में वृषभ राशि होती है।
कन्या राशि का स्वामी बुध , मकर राशि का स्वामी शनि और वृषभ राशि का स्वामी शुक्र होता है।
इस लग्न के लिए गणेश जी , दुर्गा देवी ,लक्ष्मी देवी आराध्य देव होते हैं और पन्ना, नीलम और हीरा अनुकूल रत्न होते हैं।

       तुला लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर सप्तम राशि तुला हो तो वह तुला लग्न की  कुंडली कही जायेगी। तुला लग्न में पांचवे भाव में कुम्भ राशि और नवम भाव में मिथुन राशि होती है। तुला राशि का स्वामी शुक्र , कुम्भ राशि का स्वामी शनि और मिथुन राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए लक्ष्मी देवी , काली देवी , दुर्गा देवी और गणेश जी आराध्य  देव हैं और हीरा , नीलम और पन्ना अनुकूल रत्न है।

     वृश्चिक लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर अष्ठम  राशि वृश्चिक हो तो वह वृश्चिक लग्न की  कुंडली कही जायेगी। वृश्चिक लग्न में पांचवे भाव में मीन राशि और नवम भाव में कर्क  राशि होती है। वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल , मीन राशि का स्वामी वृहस्पति और कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा होता है। इस लग्न के लिए हनुमान जी , विष्णु जी और शिव जी अराध्य देव होते है और मूंगा , पुखराज और मोती अनुकूल रत्न है।

     धनु लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर नवम राशि धनु  हो तो वह धनुलग्न की  कुंडली कही जायेगी। धनु लग्न में पांचवे भाव में मेष  राशि और नवम भाव में सिंह राशि होती है। धनु राशि का स्वामी वृहस्पति , मेष राशि का स्वामी मंगल और सिंह राशि का स्वामी सूर्य होता है।  इस लग्न के लिए विष्णु जी ,हनुमान जी और सूर्य देव आराध्य देव हैं और पुखराज , मूंगा और माणिक्य अनुकूल रत्न है।

    मकर लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर दशम  राशि मकर  हो तो वह मकर लग्न की  कुंडली कही जायेगी। मकर लग्न में पांचवे भाव में वृषभ राशि और नवम भाव में कन्या राशि होती है। मकर राशि का स्वामी शनि , वृषभ राशि का स्वामी शुक्र और कन्या राशि का स्वामी बुध होता है। इस लग्न के लिए शनि देव , हनुमान जी , दुर्गा देवी , लक्ष्मी देवी और गणेश जी आराध्य देव है और नीलम , हीरा और पन्ना अनुकूल रत्न है।

   कुम्भ लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर एकादश  राशि कुम्भ हो तो वह कुम्भ लग्न की  कुंडली कही जायेगी। कुम्भ लग्न में पांचवे भाव में मिथुन राशि और नवम भाव में तुला  राशि होती है।कुम्भ राशि का स्वामी शनि , मिथुन राशि का स्वामी बुध और तुला राशि का स्वामी शुक्र होता है। इस लगन के लिए शनि देव , काली देवी , गणेश जी , दुर्गा देवी और लक्ष्मी देवी आराध्य देव है और नीलम , पन्ना और हीरा अनुकूल रत्न है।

   मीन लग्न :-- जन्म कुंडली के प्रथम भाव में अगर द्वादश  राशि मीन  हो तो वह मीन लग्न की  कुंडली कही जायेगी। मीन लग्न में पांचवे भाव में कर्क  राशि और नवम भाव में वृश्चिक  राशि होती है। मीन राशि का स्वामी वृहस्पति , कर्क राशि का स्वामी चन्द्र और वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल होता है।  इस लग्न के लिए  विष्णु जी , शिव जी और हनुमान जी आराध्य देव है और पुखराज , मोती और मूंगा अनुकूल रत्न है।

     लेकिन यहाँ यह भी देखा जायेगा कि उपरोक्त राशि स्वामी किस भाव में और कितने अंशो पर स्थित है। क्या वो उच्च या नीच के तो नहीं है। अक्सर विद्वान् जन ग्रह के उच्च या नीच के होने पर रत्न पहना देते हैं जो कि उचित नहीं है। उच्च का ग्रह तो स्वतः ही अच्छा फल देता है।  नीच ग्रह का रत्न पहनने से उस ग्रह के नीचत्व में ही वृद्धि होती है। ऐसे में उस ग्रह को शांत करने के लिए पूजा और व्रत आदि उचित रहेगी। खराब ग्रह को अनुकूल बनाने के लिए उस देव का चालीसा का पाठ करना चाहिए।
   
       यहाँ पर यह ध्यान रखने वाली बात है कि जो ग्रह अधिक कमजोर हो उसे बलवान करने के लिए पूजा - व्रत आदि करें। रत्न भी धारण किया जा सकता है लेकिन कुंडली को अच्छी तरह विश्लेषण करवा कर ही। क्यूंकि कई बार उपरोक्त तीनों भावों के स्वामी तीसरे , छठे , आठवें और बाहरवें भाव में स्थित होते हैं। इन भावों में स्थित ग्रहों के रत्न भी धारण नहीं किये जा सकते। इस स्थिति  में व्रत-पूजन और दान ही उचित रहेगा।
 
     जिनके पास कुंडली हैं वे तो यह जान सकते हैं कि उनके ईष्ट देव कौन है। लेकिन जिनके पास कुंडली नहीं है और ना ही कोई विवरण है तो वे क्या करे या कैसे जाने  कि उनका ईष्ट कौन है !
    हर इंसान की प्रकृति और व्यवहार ग्रहों से ही तय होती है। किसी भी इंसान को उसके ईष्ट उसके अंतर्मन को आकर्षित करते हैं। अपनी पसंद के रंगो के अनुसार भी तय कर सकते हैं कि उनका ईष्ट देव कौन हो सकता है।

उपासना सियाग ( अबोहर , पंजाब )
ॐ शांति।।


Monday, January 27, 2014

गायत्री मन्त्र : एक अनुभूत प्रयोग

                                   
 " ॐ भूर्भुवः स्वः तत सवितुर्वरेण्यं 
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।"

गायत्री मन्त्र का अर्थ :-- उस सर्वरक्षक प्राणों से प्यारे, दु:खनाशक, सुखस्वरूप श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंतरात्मा में धारण करें  तथा  परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें। 

  गायत्री मन्त्र की महत्ता आदि काल से चली आ रही है। यह सूर्य देव को प्रसन्न करने का मन्त्र भी माना जाता है। जन्म-कुंडली में यही सूर्य कमजोर स्थिति में हो तो इस मन्त्र का जाप लाभदायक रहता है। 
    शांति कुञ्ज हरिद्वार से प्रकाशित पत्रिका ' अखंड-ज्योति ' के अनुसार इस मंत्र का मानसिक जाप भी फलदायक होता है। उनके अनुसार इसे आप जब चाहें चलते -फिरते , काम करते हुए , महिलाएं भोजन पकाते समय भी और रात को अगर अनिद्रा की शिकायत है तब भी इसका जाप करें तो नींद अच्छी आ जाती है। निरंतर जप से यह मन्त्र सिद्ध भी हो जाता है। 



  
हृदय रोगी इसका निरंतर जप करें तो बहुत राहत मिलती है 
 सुबह सूर्य को जल अर्पण करते हैं तब यदि अपनी मनोकामना के साथ तीन बार गायत्री मन्त्र बोला जाए तो कामना अवश्य पूर्ण होती है। 
  दिन में पौने बारह ( 11 :45 am ) से सवा बारह बजे( 12:15pm) तक इस मन्त्र का प्रसारण ( म्यूज़िक -सिस्टम से  ) किया जाए तो वास्तु दोषों में बहुत सुधार होता है। 
   बच्चे को सुबह जगाते समय और रात को सोते समय बच्चे के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए उसके उज्जवल भविष्य और सद्बुद्धि की कामना करने से बच्चे के मन-मस्तिष्क पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। 
    अपनी कोई भी मनोकामना को पूरा करने के लिए अपनी मनोकामना को बोलते हुए इस मन्त्र का इक्कीस बार जप कीजिये तो जरुर पूरी होती है। 
  यह मन्त्र हम जन कल्याण और देश हित के लिए प्रयोग करें तो और भी अच्छा होगा। जब भी पूजा करें तो कम से कम ग्यारह बार इसका जप अपने देश के हित और कल्याण के लिए अवश्य करें। 

ॐ शांति। 
   
  


Tuesday, December 17, 2013

क्या ईश्वर लालची है ...!

      क्या ईश्वर लालची है ! यह प्रश्न मेरे मन में अक्सर उठता रहता है।  जब मैं यह देखती -सुनती हूँ कि किसी ने अपनी मन्नत पूरी होने पर भगवान को बहुत सारा चढ़ावा चढ़ाया है या कोई कीमती वस्तु भेंट की  है। तो प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है ! जब ईश्वर से ही माँगना होता है तो उसे भेंट स्वरुप कोई वस्तु क्यूँ दी जाय।  क्या वह लालच में आ कर किसी  मन्नत पूरी करता है ? मुझे तो ऐसा लगता है कि  ईश्वर  प्रेम के वशीभूत हो कर ही इंसान की  पुकार सुनता है।
       मुझे याद है जब मेरा बड़ा बेटा अंशुमान  आठवीं कक्षा में था। जिस दिन उसका गणित की  परीक्षा थी। परीक्षा के बाद मेरे पास आया कि उसे रूपये चाहिए। वह ' बाला जी धाम '( हमारे शहर का प्रसिद्ध हनुमान जी का मंदिर ) में  प्रसाद चढ़ा कर आएगा। क्यूंकि उसने हनुमान जी से मन्नत मांगी थी कि पेपर अच्छा होने पर वह उनको प्रसाद चढ़ायेगा।  मैंने रूपये तो दिए क्यूंकि मन्नत जो मांगी थी। साथ ही समझाया भी कि ऐसे तो भगवान को रिश्वत देना ठीक नहीं है। अगर आपको श्रद्धा है तो भगवान से कहो कि मैं आपके मंदिर  धन्यवाद करने पैदल आऊंगा। मेहनत करने वालों का साथ भगवान् देते ही  हैं। वह समझ गया।
     लेकिन मेरे मन का प्रश्न तो ज्यों का त्यों ही है।एक तरफ तो  मंदिरों में लाखों -करोड़ों की भेंट चढ़ाते भक्त गण और वही दूसरी और मंदिर के बाहर एक -एक सिक्के के लिए तरसती -झपटती दीन -हीन लोगों की  भीड़  । तो क्या सच में ही ईश्वर प्रसन्न होता है यह सब देख कर।
    मेरे विचार से अगर अगर मन्नत का स्वरुप बदल दिया जाय। जैसे कोई साधन संपन्न मन्नत मांगने के बदले किसी मज़बूर कि कन्या का विवाह में सहायता कर दे , किसी मज़बूर के घर बनाने में सहायता करे या किसी भी जरूरत मंद की सहायता जैसे शिक्षा आदि में, और भी बहुत सारी सहायता हो सकती है। मुझे लगता है ऐसे में ईश्वर अधिक प्रसन्न होकर जल्दी मन्नत पूरी करेगा।


     जो कम समर्थ हो वह एक गुल्लक बना ले। जब भी मन्नत पूरी हो , कुछ रूपये उसमे डाल दे। एक साल बाद किसी जरूरतमंद को दे दें। मैं तो ऐसे ही करती हूँ। जब  मन्नत मांगनी होती है तो 21सुन्दरकाण्ड या 21दुर्गा सप्तशती के पाठ या 108 हनुमान चालीसा या 108 शिव चालीसा के पाठ बोलती हूँ।  फिर जितने पाठ करती जाती हूँ उतनी ही कुछ धन राशि  गुल्लक में डालती जाती हूँ। वर्ष के अंत में किसी भी जरुरी व्यक्ति को दे देती हूँ। जब हम  भगवान से मांगते  हैं तो थोड़ा कष्ट हमें  भी तो उठाना चाहिए। 
      अंशुमान के जज बनने की मन्नत मैने मांगी थी कि जज बन जायेगा तो एक बच्चे की स्कूल की फीस भर दिया करूँगी और अब ऐसा करती भी हूँ.
 ऐसा करने पर  ईश्वर बहुत अधिक प्रसन्न होगा। वह कतई लालची नहीं है। आखिर नेकी और भलाई का फल तो मिलता ही है। 

Saturday, October 5, 2013

कुछ आसान और जरुरी बातें ( 2 )

     
बहुत सारी ऐसी बातें है जो हम जानते नहीं है या जान बूझ  कर  नजर अंदाज़ कर देते हैं।  जैसे , अक्सर हम लोग हमारे मोबाईल फोन में कॉलर ट्यून या हेलो ट्यून कोई भी मन्त्र की लगा लेते हैं जोकि सर्वथा अनुचित है। क्यूंकि हर मन्त्र का अपना प्रभाव होता है। अपनी अलग ही तरंगे होती है। जब भी कभी   कोई फोन करता है और घंटी की जगह मन्त्र उच्चारित होने लगता है। कई बार फोन जल्दी ही उठा लिया जाता है और मन्त्र आधा ही रह जाता है। यह आधा मन्त्र दोष दायक हो सकता है। आज कल फोन हर जगह ले जाया जाता है। बाथरूम में भी। अब सोचने वाली बात यह है  क्या वह जगह मन्त्र के लिए उपयुक्त है।
          हम अपने इष्ट देव की तस्वीर का भी कवर फोटो फ़ोन पर लगा देते हैं। मोबाइल फोन है कहीं भी कभी आ सकता है। हम झट से उठा लेते हैं। डाइनिंग टेबल हो या बाथरूम। मुझे नहीं लगता कि हमें अशुद्ध हाथों से ईश्वर की तस्वीर छूनी चाहिए।
        हम लोग घरों में भी जगह -जगह अपने  इष्ट की तस्वीरें टांग देते है। यह  तो सभी जानते हैं कि  ईश्वर की तस्वीर शयनकक्ष में नहीं होनी चाहिए। लेकिन हम शयन कक्ष के अलावा भी  अन्य कमरों में रसोई  आदि में ईश्वर की तस्वीरे लगा देते हैं। बेशक ये हमारी धार्मिक प्रवृत्ति दर्शाती है। लेकिन ये उचित नहीं है। घर में हर वस्तु का एक नियत स्थान होता है। फिर भगवान् को इधर -उधर अपमानित क्यूँ किया जाय।
         बैठक हो या भोजन कक्ष , जहाँ पर परिवार हंसती खुशनुमा तस्वीर होनी चाहिए वहां ईश्वर को उपेक्षित क्यूँ किया जाय। बैठक में हर तरह के लोग मिलने आ सकते है। आज -कल उनके स्वागत के लिए विभिन्न प्रकार के 'पेय 'पदार्थ भी दिए जाते हैं। या छोटी -बड़ी पार्टियाँ भी की जाती है वहां भगवान का क्या काम। ऐसे तो घर में नकारात्मकता ही बढती है। रसोई में अगर चित्र लगाना हो तो अन्नपूर्णा देवी का लगाया जा सकता है। वह भी इस शर्त पर वहां मांसाहार न पकाया जाता हो।
      ईश्वर के लिए घर में  जहाँ स्थान  होता है। वहीँ होना चाहिए। सुबह शाम धूप -दीप किया जाना चाहिए।  घंटी बजा कर आरती करनी चाहिए। अक्सर लोग घरों में पत्थर के बने मंदिर भी रहने लगे हैं। यह भी गलत है। मूर्तियों की स्थापना भी करते हैं। घर अगर घर बना रहे तो ही अच्छा है  ,मूर्तियों के लिए देवालय बने हैं। क्यूंकि घर में ख़ुशी -गम ,रोग -मातम आदि होते ही रहते हैं।
 
       अक्सर देखने में यह भी आता है कि कई घरों में दिवगंत पूर्वजों की तस्वीरे भी लगा दी जाती है। मेरे विचार से यह उचित नहीं है। जो चले गए हैं वो हमारे मन में तो बसे ही होते है। उनकी तस्वीरें देख कर मन पर और भी बोझ सा पड़ता है। इस तरह से घर में नकारात्मकता ही बढती है।
    ऐसे बहुत सारी  बातें और भी है जिन पर हम दृष्टि डाल  कर भी अनदेख  कर देते हैं।

ॐ शांति ...

( चित्र गूगल से साभार )

Wednesday, October 2, 2013

नवरात्रि यानि शक्ति पर्व


 नवरात्रि यानि शक्ति पर्व। मौसम अब बदलने लगा है तो शरीर में भी आन्तरिक परिवर्तन होते है। नौ दिन के व्रत या उपवास से शरीर को नयी उर्जा प्रदान हो जाती है।
  इस वर्ष 2013 के शारदीय नवरात्रे 5 अक्टूबर दिन शनिवार, आश्विन  शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होगें।
इस दिन ब्राह्मण सरस्वती-पूजन तथा क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं।   नवरात्रि के नौ रातो में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी और  सरस्वती  तथा दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।

घट स्थापना  05 अक्टूबर 2013, शनिवार (अश्विन शुक्ल प्रतिपदा) को श्रेष्ठ समय सुबह 08 बजकर 05 मिनट से प्रातः 09 बजे तक रहेगा।
इसके  बाद  दोपहर 12 बजकर 03 मिनट से दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक बीच करना शुभ है।
 स्थिर लग्न वृश्चिक में प्रातः 09 बजकर 35 मिनट से सुबह 11 बजकर 50 मिनट तक भी घट स्थापना की जा सकती है।
माँ दुर्गा  की मूर्ति  या तसवीर को लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीले वस्त्र  के उपर स्थापित करना चाहिए। जल से स्नान के बाद, मौली चढ़ाते हुए, रोली चावल  धूप दीप एवं नैवेध से पूजा अर्चना करना चाहिए।
व्रत करने वाले को लाल वस्त्र और लाल आसन पर बैठना चाहिए। मुख पूर्व या उत्तर की तरफ होना चाहिए।

     नवरात्रि के प्रत्येक दिन माँ भगवती के एक स्वरुप श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह क्रम आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को  सुबह  से शुरू होता है। प्रतिदिन जल्दी स्नान करके माँ भगवती का ध्यान तथा पूजन करना चाहिए।
     सर्वप्रथम कलश स्थापना की जाती है।
    यह स्थापना स्वयं  या योग्य ब्राह्मण से करवाई जा सकती है।  एक साफ मिटटी के बर्तन में जौ बोये  जाते हैं। मिटटी के बीच में कलश की स्थापना की जाती है। इसके बाद दुर्गा माँ की  तस्वीर या मूर्ति की स्थापना की जाती है। लाल चुनरी अर्पित करके। धूप -दीप , नारियल  और नेवेध्य चढ़ा कर प्रतिदिन शप्तशती का पाठ करना चाहिए। पाठ के बाद सिद्धि -कुंजिका का पाठ भी विशेष फलदाई   है। सुन्दर काण्ड का पाठ भी किया जा सकता है।

नवरात्री में नित्य करने के नियम --
 १). अखंड ज्योति जलाये।
२). दीपक के नीचे चावल रखें।
३). शुद्धता और पवित्रता का ध्यान रखे  ना केवल शारीरिक ही बल्कि मानसिक पवित्रता भी बनाये रखें।  झूठ ,कपट , छल और परनिंदा से भी बचें। ब्रह्मचर्य का पालन भी आवश्यक है।
४). देवी माँ दिखावे से नहीं भक्ति से प्रसन्न होती है।
५). देवी की पूजा के बाद दूध पीने से पूजा का फल शीघ्र मिलता है।
६). " ॐ एम् ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे " , गायत्री मन्त्र का मानसिक जप भी फलदायक होता है।

       नवरात्री के अंतिम दिन कन्याओं का पूजन - भोजन करवा कर उन्हें यथा शक्ति उपहार और दक्षिणा भी दीजिये।
           मेरे विचार में यह व्रत -पूजन सिर्फ उनको ही करना चाहिए या इस व्रत के करने के वे ही अधिकारी है जिन्होंने कभी कन्या भ्रूण हत्या ना की हों। जो  भी यह  व्रत करें वे एक बार अपने दिल पर हाथ रख कर सोचे कि क्या वे सच में ये व्रत करे या कन्याओं का पूजन करें। क्यूंकि  हम कन्यायें तो चाहते है लेकिन सिर्फ दूसरों के यहाँ ही।    अंत में नवरात्रों की शुभकामनाये देते हुए मैं यही कहूँगी की कन्याओं को पूजिये  भी नहीं बल्कि सम्मान भी दीजिये।


Tuesday, September 17, 2013

पितृ दोष

       पितृ ऋण या पितृ दोष , जन्म -कुंडली में एक ऐसा दोष है जोकि  इन्सान की प्रगति में बाधक होता  है।  किसी भी कुंडली को देखने से यह बताया  है कि जातक को किस प्रकार का ऋण दोष है।
 सबसे पहले तो यह जानते हैं कि पितृ दोष क्या है। इसके बहुत सारे ज्योतिषीय कारण  है। इसे  राहू , सूर्य        वृहस्पति की विभिन्न भावों में स्थिति से जाना जा सकता है।  यह भी कई प्रकार के होते हैं जैसे पितृ ऋण , स्त्री ऋण , भगिनी ऋण , भ्राता ऋण , गुरु ऋण , मातृ ऋण आदि। यहाँ मैं सिर्फ सामान्य जन को समझ आये वह भाषा  ही कहूँगी , क्यूंकि हर किसी को कुंडली की समझ नहीं होती।
         पूर्व जन्म में यदि किसी ने किसी को संताप दिया हो जैसे दैहिक , भौतिक  या मानसिक भी , तो वह अगले जन्म में उस जातक की कुंडली में दोष बन कर जीवन में बाधा का कारण  बन जाता है।
लक्षण :--
   १) . परिवार में अशांति , विशेषतया भोजन के  समय कोई बहस या तकरार।
   २ ). कन्या संतान का जन्म और पुत्र का अभाव।
   ३ ). धन की  बरकत न होना।
   ४ ). घर में बीमारी बनी रहना।
   ५ ). निसन्तान रहना।
   ६ ). बच्चों के विवाह में अड़चन।
   ७ ). कोई भी शुभ काम के बाद कोई अशुभ होना। जैसे झगड़ा , चोट लगना , आग लगना , मौत या मौत की खबर आदि कोई भी अशुभ समाचार मिलना।
 यदि उपरोक्त लक्षण  घर में दिखाई देते  जन्म कुंडली दिखा कर उचित उपचार से शांति पाई जा सकती है।
   
    कई बार यह भी देखने में आया है कि जन्म कुंडली में कोई दोष नहीं होता है फिर भी जातक मुश्किलों में घिरा रहता है।  तो इसके लिए उसे अपने परिवार की पृष्ठभूमि  पर विचार करना चाहिए।  क्या उनके परिवार में उनके पूर्वजों का विधिवत श्राद्ध किया जाता है। क्या उसके पूर्वजों को  कहीं से मुफ्त का धन तो नहीं मिला।
       कुछ लोग श्राद्ध करने की बजाय मजबूरों को भोजन करवाना अधिक उचित समझते हैं। उनका तर्क होता है कि ब्राह्मणों की बजाय ये लोग ज्यादा आशीर्वाद देंगे।  यह बात सही है कि किसी भी भूखे को भोजन करवाएंगे तो वह आशीर्वाद देगा ही।  तो आशीर्वाद के लिए जरुर भोजन करवाएं।  लेकिन श्राद्ध कर्म तो एक ब्राह्मण ही कर सकता है और तभी पूर्वजों का आशीर्वाद भी मिलेगा।  यह श्राद्ध करने वाले को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह सुपात्र को ही आमंत्रित करे।  मंदिर का पुजारी हो तो अधिक  उचित रहेगा नहीं तो कोई भी कर्मकांडी या जनेउ धारी ब्राह्मण होना चाहिए।
           मुफ्त का धन जिसे  कोई निसन्तान व्यक्ति अपनी जायदाद विरासत में दे जाता है या ससुराल से मिला धन। मैं यहाँ उस धन की बात नहीं कर रही जो किसी स्त्री को उसके विवाह में मिला है। यहाँ मैं कहना चाहूंगी की यह वो धन है जो ससुराल में स्त्री के पिता की मृत्यु के बाद मिला है जबकि उसके भाई ना हो। ऐसी स्थिति में धन का उपभोग तो हो रहा है लेकिन जिसके धन का उपभोग हो रहा है उसके नाम का कोई भी दान -पुन्य नहीं किया जा रहा।
           हमारे समाज में वंश परम्परा चलती है इसी के सिलसिले में पुत्र का जन्म अनिवार्य माना गया है। अगर पुत्र ना हो तो उसकी विरासत पुत्रियों में बाँट दी जाती है। जैसे की समाज का चलन है तो विचार भी यही  हैं कि अगर पुत्र नहीं होगा तो उसका कमाया धन लोग ही खायेंगे। उनका नाम लेने वाला कोई नहीं होगा , आदि -आदि। जब ऐसे इन्सान के धन का उपभोग किया जाये और उसके नाम को भी याद ना किया जाये तो घर में अशांति तो होगी ही। एक अशांत आत्मा किसी को खुश रहने का आशीर्वाद कैसे दे सकती है। ऐसी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध तो करना ही चाहिए।  साथ ही वर्ष में एक बार उसके नाम का कोई दान कर देना चाहिए।  जैसे किसी जरूरत मंद कन्या का विवाह , कहीं पानी की व्यवस्था , या किसी बच्चे की स्कूल की फीस आदि कुछ न कुछ धन राशि जरुर उसके नाम की निकालनी चाहिए।
         जब किसी को परिवार से ही जैसे ताऊ या  चाचा जो कि या  निसन्तान हो या अविवाहित हो।  अथवा असमय अकाल मौत हुई हो और उनका कोई वारिस ना  हो तो ऐसे धन का उपभोग भी  परिवार में अशांति लाता है। अक्सर देखा गया है कि ऐसे धन को उपभोग  वाले की सबसे  छोटी संतान अधिक संताप भोगती है।
            'ऐसे में  फिर क्या किया जाए  ?'
    यहाँ भी जिसका भी धन उपभोग किया जा रहा है उसका विधिवत श्राद्ध और उसके नाम से कुछ धन राशी का दान किया जाये तो शांति  बनी रह सकती है।
        कई बार परिवार के कुल देवता का अनादर भी परिवार में अशांति  का कारण बनती है। ये जो  कुल देवता या पितृ होते हैं , वे हमारे और ईश्वर के मध्य संदेशवाहक का कार्य हैं।  यदि ये प्रसन्न होंगे तो ईश्वर की कृपा जल्दी प्राप्त होती है।
         कई बार कोई व्यक्ति किसी निसंतान दम्पति द्वारा  गोद लिया जाता है। ऐसे में उसे , वह जिस परिवार में जन्मा है , उस परिवार के कुल देवताओं की पूजा भी करने पड़ती है। क्यूंकि उसमें उस परिवार का (जहाँ जन्म लिया है उसने ) भी ऋण चुकाना होता है। जहाँ वह रहता है वहां के कुल देवता की भी पूजा करनी होती है उसे। तभी उसके जीवन में शांति बनी रहती है।


          दोष हैं तो हल भी है :--
 १ ) .  श्राद्ध कर के ब्राह्मण को वस्त्र -दक्षिणा आदि दीजिये।
२ ).  गाय की सेवा कीजिये।  इसके लिए किसी भी मजबूर व्यक्ति की गाय के लिए साल भर के लिए चारे की व्यवस्था कीजिये।
३ ). चिड़ियों को बाजरी के दाने  डालिए।
४ ). कोवों को रोटी।
५ ). हर अमावस्या को मंदिर में सूखी रसोई और दूध का दान कीजिये।
६ ).  हर मौसम में जो भी नई सब्जी और फल हो उसे पहले अपने पितरों और कुल देवताओं के नाम मंदिर में दान दीजिये।
७ ). हर अमावस्या को गाय को हरा चारा डलवायें।
८ ) . किसी धार्मिक स्थल पर आम और पीपल का वृक्ष लगवा दे।
९ ). तुलसी की सेवा।
१०). अपने पूर्वजों के नाम पर जल की व्यवस्था करनी चाहिए।
पितरो  के निमित्त  दूध देने की विधि :--- एक गिलास कच्चे  दूध में  चीनी मिला कर  छान लीजिये। अब थोडा दूध एक कटोरी में डाल  कर उसे अपनी हथेली से ढक कर विष्णु भगवान को स्मरण करते हुए कहिये , " विष्णु भगवान के लिए। " गिलास के बचे हुए दूध को भी हथेली से ढकते हुए कहिये , " सभी पितरों के लिए। " अब कटोरी के दूध को गिलास के दूध में मिला दीजिये।  यह दूध पुजारी को पीने को दीजिये साथ ही श्रद्धा अनुसार दक्षिणा भी दीजिये।
        सुन्दर काण्ड , गीता और आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ भी पितृ दोष में शांति देता है।


ॐ शांति  …।